
शरीर और आत्मा को अलग मानना ही सम्यकदर्शन है, ,,सुनयमति जी
खंडवा।। प्रत्येक जीव में एक आत्मा निवास करता है।उस जीव के शरीर के परिमाण के अनुसार वह अपने आपको छोटा बड़ा कर लेता है। एक चींटी में भी वही आत्मा है और हाथी के शरीर मे भी वही आत्मा है।उसी तरह एकेन्द्रिय जीव पेड़ पौधे में भी वही आत्मा विद्यमान रहती है।इसीलिये आत्मा को असंख्यात प्रदेशी कहा गया है।यह आत्मा अजर अमर होता है।मृत्यु हमेशा उस शरीर की होती है।आत्मा तो तुरंत नये शरीर मे प्रवेश कर जाती है।यह आत्मा जन्म,जरा,मृत्यु,युवा,बालक,स्त्री,पुरुष,नपुंसक की विशेषताओं से रहित होता है। यही यथार्थ चिंतन आत्मा के शुद्ध स्वरूप को पहचानने में सहायक सिद्ध होता है।
जैन आगम की विशिष्ट पहचान इष्टोपदेश ग्रन्थ पर व्याख्यान देते हुए सुनयमती माताजी ने कहा कि यह ग्रन्थ आचार्य पूज्यपाद स्वामी की उत्कृष्ट रचना है।इसमें जहां आत्मा के बारे में मिथ्या भ्रांतियों के बारे में भी बताया गया है वहीं मुनिराजों के चिंतन को भी स्पष्ट किया है।हमें सात व्यसन,दुर्गतियों और हिंसा,झूठ, चोरी आदि पांच पापों से डरना चाहिये।इसके विपरीत शुभ कार्यों,धर्म क्रियाओं में सदैव आगे रहना चाहिए।इस ग्रँथराज मे आचार्य भगवन ने भोगों को छोड़ने को महत्वपूर्ण बताया है।हमारी इंद्रियों के वशीभूत होकर हम भोगों को भोगने में आनन्द मानते है।
मुनि सेवा समिति मीडिया प्रभारी सुनील जैन एवं प्रेमांशु चौधरी ने बताया कि आचार्य सुन्दरसागर जी की शिष्या सुनयमती जी ससंघ विगत 15 दिन से खण्डवा के नवकार नगर स्थित मुनिसुव्रतनाथ जिनालय में विराजमान होकर जैन धर्म की प्रभावना कर रही है।माताजी के संघ में क्षुल्लिका सुधन्यमती जी एवम क्षुल्लक सुपर्वसागर जी भी विराजमान है।प्रवचनमाला के पूर्व मंगलाचरण वन्दना अविनाश जैन ने किया।आहारचर्या का अवसर विनोद अंकित बड़जात्या,महेंद्र, प्रवीण बैनाड़ा एवम अलका नरेंद्र रावका परिवार को मिला।









